Maa
माँ कभी सुना हैं , एक अल्फ़ाज़ , जिसमे पूरी दुनिया समाती हैं .. जिसे पुकारते ही , कितनी सुकून भरी , मुस्कुराहट आती हैं .. घर आते ही जिसे खोजता हूँ , ना दिखे तो थोड़ा डरता हूँ .. फिर पूछता हूँ , माँ कब आएगी .. भले कोई काम ना हो , बस माँ का दिखना ज़रूरी हैं .. उसके होने से हर खुशी , ना होने से ज़िंदगी अधूरी हैं .. ना जाने कितने शब्दो को , नया आयाम दिया हैं एक अल्फ़ाज़ ने .. सुकून , राहत , ज़िंदगी , भगवान , कितने ही रूप छिपे हैं माँ में .. माँ , वो परछाई जिसने हर दफ़ा , धूप से बचाया हैं .. माँ , वो रूह जिसने हर दफ़ा , गिरने पे उठाया हैं .. माँ , वो पहरा जिसने हर दफ़ा , मुश्किलो से बचाया है .. माँ , वो रात जिसने हर दफ़ा , ख्वाब देखना सिखाया हैं .. माँ , वो किताब जिसने हर द...